नेह का आव्हान फिर फिर
यह उठी आँधी कि नभ में
छा गया सहसा अँधेरा
धूलि धूसर बादलों ने
भूमि को इस भाँती घेरा
रात सा दिन हो गया
फिर रात आई और काली
लग रहा था अब न होगा
इस निशा का फिर सवेरा
रात के उत्पात भय से
भीत जन जन भीत कण कण
किंतु प्राची से उषा की
मोहिनी मुस्कान फिर फिर
नीड का निर्माण फिर फिर
नेह का आव्हान फिर फिर
क्रुद्ध नभ के वज्र दंतों में
क्रुद्ध नभ के वज्र दंतों में
उषा है मुसकराती
घोर गर्जनमय गगन के
कंठ में खग पंक्ति गाती
एक चिडिया चोंच में तिनका लिए
जो जा रही है
वह सहज में ही पवन
उनचास को नीचा दिखा रही है
नाश के दुःख से कभी
दबता नहीं निर्माण का सुख
प्रलय की निस्तब्धता में
सृष्टि का नवगान फिर फिर
नीड का निर्माण फिर फिर
नेह का आव्हान फिर फिर
- हरिवंश राय बच्चन